Saturday, 19 September 2020

Canteen Café De Laila, Nostalgia of Aligs: Chai Garam, Kam Shakkar Tez Patti

The grand wheel of time always moves on.The present glories of culture and people fades out to be buried under sand of time. Today I am trying to uncover a nostalgia memory of “Café De Laila”. Recalling those days, when “Café De Laila” was a fanfare ,full of life, laughs, full of aroma of boiing tea. Those were were the days crowded with chai lover’s. Group of students, university office staff used to sit on antiquated chairs in wait of their cupp of Garam Chai.


Café De Laila lies near Students Union building and in  between  Stat Bank of India AMU branch and Arabic Deptt named Ali bagh . The arched door with an iron gate leads into a small compound with a lazy earthy ambience. Now it has a “sarkari saste ghalle ki dukan”.

On those days V.C and administrative office was in SS. Hall (South), down and up stairs of Victoria gate. So the nearest tea dhaba was “Café De Laila”.   


Café De Laila was started in 1933 by AMU Aligarh. First it was managed by Mr. Abdul Hafeez. Once upon a time; it was one of the most visited canteen of the campus of Aligarh Muslim University. It enjoyed the regular flow of students.


87 Years passed. “Guzra huwa waqt wapas nahi aata bus yaden rah jati hain”. Generations graduated after each other, they sipped here Garam Chai, laughed, involved in literary conversations and some time hot discussions too. They took something else apart from their degrees from this place: the unending love for tea.


Canteen Café De laila was allotted to run on tender basis. Last owner was Mr Nisar Ahmad of Meerut. After 1917, university stopped tendering. Then it was closed. University is planning some new construction over this plot.


Then the chai was always served brewed in a white porcelain teapot and matching cups and saucers! Famous for Matri-omelette, half-fry eggs, oily parathas and the well-known over-steeped tea of Aligarh, Kam shakkar Tez patt, mean storng tea.


On a lazy  day I entered inside box shaped small building of Café De Laila. Seeing this abandoned desolated Café De Laila, I was shocked. “Aise veerane men ek din ghut ke mar jayenge hum”.


Topi Shukla and Café De Laila

Topi Shukla  a Hindi novel written by Rahi Masoom Raza (He too was an Alig) in 1987. Topi Shukla is main character of this novel. Interesting that “Café De Laila” ,has a mention in this novel too.


टोपी शुक्ला बनारस से अलीगढ़ मुस्लिम विवि में शोध करने जाता है और प्रो. इफ्फन के घर रहने लगता है। प्रोफेसर की पत्नी से उसकी मित्रता जरूर है लेकिन मुस्लिम लीग की दो राष्ट्रवादी थ्योरी को वह समझ नहीं पाता।


टोपी शुक्ला, एक अत्यन्त प्रभावपूर्ण और मर्म पर चोट करने वाली कहानी है। टोपी शुक्ला ऐसे हिन्दुस्तानी नागरिक का प्रतीक है जो मुस्लिम लीग की दो राष्ट्रवाली थ्योरी और भारत विभाजन के बावजूद आज भी अपने को विशुद्ध भारतीय समझता है - हिन्दू-मुस्लिम या शुक्ला, गुप्त, मिश्रा जैसे संकुचित अभिधानों को वह नहीं मानता।


ऐसे स्वजनों से उसे घृणा है जो वेश्यावृत्ति करते हुए ब्राह्मणपना बचाकर रखते हैं, पर स्वयं उससे इसलिए घृणा करते हैं कि वह मुस्लिम मित्रों का समर्थक और हामी है। अन्त में टोपी शुक्ला ऐसे ही लोगों से कम्प्रोमाइज नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है। यह उपन्यास आज के हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों को पूरी सच्चाई के साथ पेश करते हुए हमारे आज के बुद्धिजीवियों के सामने एक प्रश्नचिद्द खड़ा करता है।


“Iffan ke yahan uska aana janaa itna badha ki shamshad market, staff club, cafe de phoos aur“Café De Laila” men iski baate hone lagi”(From Topi Shukla)


Every door and wall of University has story attached to it, waiting to be told by someone, and one among them is “Café De Laila”. Entering Café de Laila through its mausoleum-like door is like travelling back in time.


Recalling memories from 70’s.On those days, there was no any building by its side but a big open space. It lies just behind “3 university road” (now admission Section) and Administrative block.


The grand spacious bunglow “3-University Road”, was housed by Dr Abdul Aleem Saheb, Chairman Department of Arabic (1956-1968). Later He became Vice Chancellor (1968-1974) of AMU. Aligarh.


On those days there was a small opening in boundary wall and that was the shortest way for Aleem saheb to go on foot from his residence ‘3-University Road” to departmet in Zahoor Ward.


It was culture and Tahzib of those days that Aligs there sipping chai, used to stand and raise hands for a salam, and Aleem saheb used to pass with a light smile on his face.


Poet Majaz and “Café De Laila”. Har Sham Hai Sham- e- Misr Yahan”

Those were the golden period of Aligs culture, when “Café De Laila” used to be common meeting point of intellectuals, poets, writers of those days, like Majaz, jazbi, Jan Nisar Akhtar, Akhtar-u-l Iman, ‘Akhtar Husain Raipuri’, ‘Sibt-e-Hasan’, ‘Hayat-ul-lah Ansari’, ‘Sa’adat Husain Manto’, ‘Al-e-Ahmad Suroor’, ‘Ali Sardar Jafri’,Qazi Abdus Sattar,Sharyar,etc and many more.“Har Sham Hai Sham- e- Misr Yahan”


Speaking of Majaz, he is credited to have coined the name of the oldest tea joint in Aligarh, Café de Laila. The legend goes that he had initially named it Alif Laila, when it was first established in 1933.


It is said that: A British Professor had then changed it to Café de Laila. The owner of the establishment, recounts that he bought the café in 1991 from Abdul Hafeez, because Hafeez’s son “chai ka karobaar samajhte the, zayeka nahin” (he understood the business of tea, but not its taste).


Aligarh had a tahzeeb which slowly disappeared with Dhaba culture! Sir Syed Ahmed Khan did not have material possession but he had his vision which made him work hard even in old age. You have given dreams to the Aligs that the AMU can be among the best in India and in the World.


Once upon a time, Aligarian Tahzeeb and Traditions were followed religiously by students. The proper dress code, well polished shoe to properly combed hair.

They used to maintain their “class”, not wearing chappals on road. Of late, this "class" has been replaced by a "mass approach" which has promoted the out growth of roadside dhabas all around the University campus.


“Café De Laila” culture is over, it is replaced by an unending Dhabas. Have a stroll in campus from Shamshad Market to Purani chungi. You will find major part of the market resting under the shades of Banyan trees.


What strikes first, is the unhygienic roadside tea stalls. Hordes of students sitting and chatting at these dhabas in Shamshad Market, Purani Chungi. Other iconic Dhaba zones are Zakariya Market, Dodhpur and even Tasveer Mahal.


We Aligs had stopped dreaming like that for decades. Gone were the days of glory when AMU gave the leaders of international stature to the world. Now we are too proud to have given Azam Khan, which is also a story of AMU several decades ago. We should not settle for anything

The End

Monday, 14 September 2020

Sahir Wizard of Words:साहिर की माँ उनके पिता की ग्यारवीं बीवी थीं. औरत ने जनम दिया मर्दों को,मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

Sahir was wizard of words.Poet of love ,romance and revolution.

साहिर की माँ उनके पिता की ग्यारवीं बीवी थीं। जब उनके पिता ने बाहरवीं शादी की तो उनकी माँ सरदार बेग़म का ये भरम भी जाता रहा कि वो पुत्र प्राप्ति के लिए शादी कर रहे हैं। अब आईने से गर्द हट चुकी थी और उनकी माँ को ये एहसास हो गया था कि उनका शौहर एक अय्यास आदमी है।


उन्होंने स्त्री के जीवन की त्रासदी को बरास्ते अपनी माँ भोगा था और उसे अपनी शायरी में आवाज़ भी दी थी।


उन्होंने लिखा---

औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जब चाहा मसला, कुचला जब चाहा दुत्कार दिया

मर्दों के लिए हर जुल्म रवा, औरत के लिए रोना भी खता

मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता


जिसके लिए औरतें जिस्म की भूख का सामान और अय्यासी का साधन मात्र हैं। जो जितना रईस होता है उसके पास उतनी विलासिता के साधन होते हैं। उतने ही विकल्प।


अब साहिर की माँ ख़ुद को अपने पति की नज़रों में किसी वस्तु, भोग का साधन, विलासिता के विकल्प से ज़्यादा नहीं देख पा रहीं थी। ऐसे ही उलझे हुए खयालों और सवालों वाली किसी रात उन्होंने तय किया कि वो अपने पति के साथ नहीं रहेंगी।


उनकी 12 माएँ थीं और एक पिता।

पहले बात करते हैं उनके असली नाम की. वैसे तो अब्दुल हई एक आम नाम है, लेकिन उनका यह नाम यूं ही नहीं रखा गया. दरअसल उनके पड़ोस में एक बहुत बड़ा राजनीतिक आदमी रहता था जिसका नाम भी अब्दुल हई था, जिससे उनके पिता की बिल्कुल भी नहीं बनती थी.


उस आदमी के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने के लिए उनके पिता ने अपने बेटे का नाम अब्दुल हई रखा. अपने बेटे के बहाने वह उस आदमी को भला बुरा कह कर अपना दिल हल्का कर लेते थे. उनके पिता ने कभी भी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को नहीं समझा.


उन्होंने 12 औरतों से निकाह किया. साहिर 11वीं पत्नी के बेटे थे. उनके पिता का व्यवहार ठीक होने की वजह से उनकी मां ने अपने पति फज़ल मोहम्मद से तलाक ले लिया और अपने भाई के पास आकर रहने लगीं.


उनकी 12 माएँ थीं और एक पिता। ये कहानीनुमा बात अब्दुल हयी के जीवन का यथार्थ थी। इसे ही शायद जादुई यथार्थवाद कहते हैं। जहाँ कुछ असंगत, कहानीनुमा, काल्पनिक सी बात यथार्थ में घटित होती है। अब्दुल हयी के जीवन के इसी तल्ख़ जादू ने उन्हें हर्फ़ों का जादूगर बना दिया। और वो अब्दुल हयी से शायर साहिर लुधियानवी बन गए। साहिर का शाब्दिक अर्थ जादूगर होता है।


उनके पति के पास बहुत सी औरतें थीं पर बेटा एक था। बेटा सिर्फ़ बेटा नहीं होता वह कुल का दीपक भी होता है। और कुल तो सिर्फ़ पुरुषों का होता है। महिलाओं का कोई कुल नहीं होता। सो मामला अदालत में पहुँच गया। मसअला था साहिर पर हक़ का।


अदालत में नन्हें साहिर ने अपनी माँ को चुना। और अदालत ने बच्चे को माँ की ज़्यादा ज़रूरत है, के सिद्धांत के आधार पर साहिर को उनकी माँ सरदार बेग़म को सौंप दिया।


ये साधारण सी घटना मर्दवादी मस्तिष्क पर आघात थी। कुल का चराग़ एक औरत कैसे हथिया सकती है। वो तो बेटा पैदा करने की मशीन भर है। पितृसत्ता की नज़र में बेटा पिता की खेती है। उसके पौरुष का फल।


तो साहिर का उनकी माँ के पास जाना उनके पिता फ़ज़ल मुहम्मद को अखर गया और उन्होंने अपने कारिंदे उन्हें ख़त्म करने के लिए लगा दिए। ये ऐसे ही था जैसे जो वस्तु मेरी नहीं वो किसी और की नहीं हो सकती। एक जीती जागती जान का, एक इंसानी बच्चे का वस्तु में बदल जाना कितना त्रासद हो सकता है ये साहिर और उनकी माँ ही समझ सकते थे। साहिर की माँ ने अपने गहने ज़ेवरात बेंच कर अपने बच्चे के लिए अंग रक्षक रखे। ताकि वो उसे अपने पति के हाथों मारे जाने से बचा सकें।


साहिर का जन्म 8 मार्च 1921 में पंजाब के लुधियाना शहर में एक ज़मीदार परिवार में हुआ. उनका बचपन उनके मोहब्बत के गीतों की तरह खुशग़वार नहीं रही.उनके वालिद और वालिदा के बीच रिश्तें काफी तल्ख़ भरे थे. खराब रिश्तों की वजह से हर दिन घर में झगड़ा होता था. यही कारण रहा कि एक वक्त पर जब उनके वालिद ने दूसरी शादी कर ली तब उनकी वालिदा उनको लेकर लुधियाना से लाहौर चली गईं।


साहिर अपनी मां से कितनी मोहब्बत करते थे इसका एक उदाहरण यह है कि जब लुधियाना से उनकी मां उन्हें लेकर लाहौर जा रही थीं तब साहिर महज 13 साल के थे. ट्रेन में अपनी मां से लिपटे साहिर ने कहा

अम्मी, मैं अब्बा की गालियां और मार रोज़ खा लूंगा, उफ़ तक नहीं करूंगा. पर चलो, ख़ुदा के वास्ते चलो यहां से.’ इस पर उनकी वालिदा ने उत्तर दिया, ‘अब यही अपना घर है और यहीं रहना है हमको, बेटा’. अपने अब्बा को भूल जाओ. वो ज़ालिम इंसान है।क्योंकि वो तुमसे नफरत करता हैं.''


यह कहते ही साहिर की वालिदा की आंखों से आंसू गिरने लगे मां।को रोता देख साहिर भी जोर-जोर से रोने लगे. ‘अम्मी, वादा करो तुम मुझे कभी छोड़ कर जाओगी.’ अपने वालिद का अपनी वालिदा के लिए खराब व्यवहार ने साहिर के बाल अवस्था या बाल मन पर उसका ऐसा प्रभाव छोड़ा कि उन्होंने बड़े हो कर लिखा


औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया


साहिर का अपनी मां से प्यार ही था जिसकी वजह से औरतों के दर्द, उनके सम्मान और अधिकार की बात वह अपने शेरों और गीतों में करते रहे।

दुनिया ने तजुरबातो-हवादिस की शक्ल में

जो कुछ मुझे दिया है लौटा रहा हूं मैं


साहिर को हालातों ने सिखाया था कि दुनिया भर में जितनी भी रौनकें हैं वह औरतों के दम से हैं ।जितने भी रास्ते रौशन हैं वह औरतों की वजह से ही है। दरअसल साहिर समझते थे कि किसी भी मर्द के लिए एक अच्छा इंसान बनने की पहली और आखिरी शर्त एक औरत का सम्मान और उसकी भावनाओं की कद्र करना है।


साल था 1978, का माँ साहिर को छोड़ कर हमेशा हमेशा के लिए चली गईं। कहाँ ? एक ऐसी जगह जिसका पता किसी को नहीं मालूम। समझदार लोग नासमझी में उसे अल्लाह मियां का घर कहते हैं और धर्म की किताब जन्नत। पर साहिर की जन्नत तो उनकी माँ के क़दमों में थी।


सो साहिर माँ के जाने के बाद भीतर से दरकने लगे। और उनके हिस्से की तन्हाई माँ के जाने के बाद और बढ़ गई। माँ के जाने के बाद दुनिया का साहिर लुधियानवी और अपनी माँ का अब्दुल हयी दो साल भी नहीं जी सका। और 25 अक्टूबर 1980 की रात शराब की नीम बेहोशी में मौत के आग़ोश में समा गया। मौत की वजह हार्ट अटैक थी। उनके दिल पर हमले तो उनके जन्म से पहले ही होते रहे।


साहिर ने अपनी माँ के साथ हुए अन्याय को माँ के साथ भोगा था। इसलिए उनका यक़ीन दुनिया और ख़ुदा दोनों से उठ गया था।


इसलिए वो उस सुबह के इंतज़ार में जब हर ज़ुल्म--सितम मिट जाएगा गाते रहे, "वो सुबह कभी तो आएगी" और साथ ही दुनिया को लानत भेजते हुए कहते रहे "ये दुनिया दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है"


साहिर के अंदर आये इस बदलाव को समझने के लिए उस दौर पर एक नज़र डाली जाए. 60 के दशक में रूस के कम्युनिस्ट लीडर निकिता ख्रुश्चेव ने स्टालिन के ख़िलाफ़ बोलकर और सोवियत रूस की अंदरूनी नीतियों में बदलाव करके साम्यवाद के अंत की शुरुआत कर दी थी.

चीन की हिंदुस्तान से जंग ने वामपंथी आंदोलनों की जड़ें हिला दीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी कम्युनिस्ट आंदोलन के विरोधाभास ज़ाहिर होते जा रहे थे और बचपन की ग़ुरबत और कम्युनिस्ट शायरों की बदहाली ने भी शायद साहिर की सोच में कुछ तब्दीली कर दी थी. ख़ैर, जो भी हो उनकी नफ़्सियाती (रोमांटिक) और नज़रियाती (गंभीर) शायरी दोनों ही कमाल की हैं।


"साढ़े पाँच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी लंबी लचकीली टाँगें, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आँखें, आंखों से झींपाझींपा सा तफ़क्कुर, बड़े बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन."

साहिर को महफ़िलें जमाने का शौक

साहिर लुधियानवी के वालिद रईस ज़मींदार थे. साहिर ने भी ख़ूब इनाम--इकराम--दौलत कमाई और दोस्तों पर ख़ूब ख़र्च भी की. उन्हें महफ़िलें जमाने का शौक रहा. रात भर चलती दावतों में, जिनमें महंगी शराबें और शेर--सुख़न के दौर होते थे, शरीक होने वाले राजिंदर सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर, सरदार जाफ़री और जांनिसारअख़्तरजैसे नाम थे.


वो हर किसी शायर का मज़ाक़ उड़ाते और अपने दोस्तों को गालियों से भी ख़ूब नवाज़ते. अपने दोस्तों और नौजवान शायरों को दरबारी की हैसियत से देखने का नज़रिया शायद उन्हें अपने ज़मींदार बाप से विरसे में मिला था.

जांनिसार अख़्तर साहिर के सबसे बड़े दरबारी थे.

जांनिसार अख़्तर साहिर के सबसे बड़े दरबारी थे. उनका रहना-खाना-पीना सब साहिर की ज़िम्मेदारी थी और साहिर की हां में हां मिलाना जांनिसार की. बक़ौल निदा, ‘...साहिर को अपनी तन्हाई से डर लगता था और जांनिसार उनके इस ख़ौफ़ को कम करने का माध्यम थे.


इसके लिए उन्हें हर महीने एक तयशुदा रक़म भी मिलती थी. साहिर का नाम उन दिनों फिल्मों में सफलता की ज़मानत समझा जाता था. दूसरों की मदद करना उनके लिए मुश्किल था और जांनिसार सिर्फ़ दोस्त ही नहीं ज़रूरत से ज़्यादा जल्दी शेर लिखने वाले शायर भी थे. साहिर को एक पंक्ति सोचने में जितना समय लगता था, जांनिसार उतने समय में 25 पंक्तियां जोड़ लेते थे. एक तरफ़ ज़रूरत थी, दूसरी ओर दौलत.’


जांनिसार ने अपने दौर में एक फिल्म बनाई थी - बहू बेगम. इस फिल्म के गीत साहिर के नाम पर हैं. ये फिल्म पिट गयी थी और गीतकार जांनिसार की साहिर को लेने की तिजारती मजबूरी को उनकी नाक़ाबिलियत समझा गया. निदा लिखते हैं, ‘जांनिसार तहज़ीबदार आदमी थे और उन्होंने घर की बात को बाहर नहीं निकाला पर एक शेर में कुछ इशारा ज़रूर किया है - ‘शायरी तुझको गंवाया है बहुत दिन हमने.’ अब जांनिसार हैं और ही साहिर जोबहू बेगमके और बाक़ी गीतों का सच बताएं.

एक बार निदा फ़ाज़ली भी