Thursday, 28 February 2019

Krishna Kumari: The Rajput Princess,Chose Death Pyre To Save Her Dynasty

Here is the story of a true princess Krishna Kumari (1794 –1810), who chose death before a war was ignited.She choose death instead of putting the lives of their people at risk.Reality is harsh and painful. It is not lyrical fiction and it does not have Romeo-and-Juliet kind of endings.
 It was my second day of tour in Udaipur. We were in city palace of Udaipur and standing inside Krishna Vilas.  Krishna Vilas is another chamber inside City Palace, which has rich collection of miniature paintings that portray royal processions, festivals and games of the Maharanas.
However, there is tragic story linked to this wing of the City Palace. In the 19th century, a royal princess was unable to choose from two suitors seeking her hand in marriage, one from the royal family of Jaipur and another from Jodhpur, and hence in a state of dilemma, she poisoned herself to death
Princess Krishna Kumari was a Rajput princess with many suitors. A succession of battles was fought to gain her hand. Unlike Padmini, she was a real figure whose story was detailed in annals and letters composed during her life and immediately after her death. 

The manner of that death was unique and tragic, so shameful that no bard was ever commissioned to glorify it in verse.
Rana Bhim Singh was the ruler of Mewar in the early nineteenth century. The state had lost all its power and was beset by enemies from all sides.
The Marathas from the southwest had overrun parts of it and extorted levies from his subjects, while the states of Jaipur and Marwar were poised to attack him.
Jaipur and Marwar threatened war, not to increase their kingdoms but for another reason. Both the princes, Jagat Singh of Jaipur and the Raja Man of Marwar wanted to marry the Sisodia princess, Krishna Kumari, daughter of Bhim Singh. Bhim Singh dared not refuse either. He knew that whoever lost the hand of his daughter would join his enemies and attack his state.
Krishna Kumari, the young, sixteen-year beauty, was told of her father's predicament. She was determined to maintain the heroic tradition of her race and die rather than plunge her country into war
 Poison made of the Kasumba blossom was prepared for her. When the fatal cup was presented to her she received it with a smile, I fear not to die. Rajkumari Krishna Kumari drank it, and fell into a deep sleep … from which she never woke.

It happened in Krishna Vilas of the Udaipur palace, in a room that is still preserved exactly as it was when the brave Krishna Kumari gave her life to save the state of Mewar from war.
 Her mother, heartbroken at her daughter's fate, died soon after her. And Rana Bhim Singh, too weak to have prevented the sacrifice, consoled himself through the lonely years of his remaining life by turning his daughter's room into shrine of beauty and splendor.
The delicately frescoed Krishna Mahal is now a memorial to the girl (photography not permitted) in Udaipur City Palace, where respect can be paid to a brave little princess who became the victim of political circumstance.The room contains some of Mewar's best miniature paintings.The brave Krishna Kumari gave her life to save the state of Mewar from war.
Written and posted by Engr Maqbool Akram, with help of various materials available on net. 





Sunday, 24 February 2019

Thanda Gosht:Aligarh Wale Saadat Hasan Manto ki Ek Badnam Kahani

ईश्वरसिंह ज्यों ही होटल के कमरे में दांखिला हुआ, कुलवन्त कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तेज आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की चिटखनी बन्द कर दी। रात के बारह बज चुके थे। शहर का वातावरण एक अजीब रहस्यमयी खामोशी में गर्क था।

कुलवन्त कौर पलंग पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गयी। ईशरसिंह, जो शायद अपने समस्यापूर्ण विचारों के उलझे हुए धागे खोल रहा था, हाथ में किरपान लेकर उस कोने में खड़ा था। कुछ क्षण इसी तरह खामोशी में बीत गये। कुलवन्त कौर को थोड़ी देर के बाद अपना आसन पसन्द आया और दोनों टाँगें पलंग के नीचे लटकाकर उन्हें हिलाने लगी। ईशरसिंह फिर भी कुछ बोला।

कुलवन्त कौर भरे-भरे हाथ-पैरों वाली औरत थी। चौड़े-चकले कूल्हे थुल-थुल करने वाले गोश्त से भरपूर। कुछ बहुत ही ज्यादा ऊपर को उठा हुआ सीना,तेज आँखें, ऊपरी होंठ पर सुरमई गुबार, ठोड़ी की बनावट से पता चलता था कि बड़े धड़ल्ले की औरत है।

ईशरसिंह सिर नीचा किये एक कोने में चुपचाप खड़ा था। सिर पर उसके कसकर बाँधी हुई पगड़ी ढीली हो रही थी। उसने हाथ में जो किरपान थामी हुई थी, उसमें थोड़ी-थोड़ी कम्पन थी, उसके आकार-प्रकार और डील-डौल से पता चलता था कि वह कुलवन्त कौर जैसी औरत के लिए सबसे उपयुक्त मर्द है।

कुछ क्षण जब इसी तरह खामोशी में बीत गये तो कुलवन्त कौर छलक पड़ी, लेकिन तेज-तेज आँखों को नचाकर वह सिर्फ इस कदर कह सकी-''ईशरसियाँ!''

ईशरसिंह ने गर्दन उठाकर कुलवन्त कौर की तरफ देखा, मगर उसकी निगाहों की गोलियों की ताब लाकर मुँह दूसरी तरफ मोड लिया।
कुलवन्त कौर चिल्लायी-''ईशरसिंह!'' लेकिन फौरन ही आवांज भींच ली, पलंग पर से उठकर उसकी तरफ होती हुई बोली-''कहाँ गायब रहे तुम इतने दिन?''

ईशरसिंह ने खुश्क होठों पर जबान फेरी, ''मुझे मालूम नहीं।''

कुलवन्त कौर भन्ना गयी, ''यह भी कोई माइयावाँ जवाब है!''


ईशरसिंह ने किरपान एक तरफ फेंक दी और पलंग पर लेट गया। ऐसा मालूम होता था, वह कई दिनों का बीमार है। कुलवन्त कौर ने पलंग की तरफ देखा, जो अब ईशरसिंह से लबालब भरा था और उसके दिल में हमदर्दी की भावना पैदा हो गयी। चुनांचे उसके माथे पर हाथ रखकर उसने बड़े प्यार से पूछा-''जानी, क्या हुआ तुम्हें?'
Manto with his wife
ईशरसिंह छत की तरफ देख रहा था। उससे निगाहें हटाकर उसने कुलवन्त कौर ने परिचित चेहरे की टटोलना शुरू किया-''कुलवन्त।''

आवांज में दर्द था। कुलवन्त कौर सारी-की-सारी सिमटकर अपने ऊपरी होंठ में गयी, ''हाँ, जानी।'' कहकर वह उसको दाँतों से काटने लगी।

ईशरसिंह ने पगड़ी उतार दी। कुलवन्त कौर की तरफ सहारा लेनेवाली निगाहों से देखा। उसके गोश्त भरे कुल्हे पर जोर से थप्पा मारा और सिर को झटका देकर अपने-आपसे कहा, ''इस कुड़ी दा दिमांग ही खराब है।''

झटके देने से उसके केश खुल गये। कुलवन्त अँगुलियों से उनमें कंघी करने लगी। ऐसा करते हुए उसने बड़े प्यार से पूछा, ''ईशरसियाँ, कहाँ रहे तुम इतने दिन?''
''बुरे की मां के घर।'' ईशरसिंह ने कुलवन्त कौर को घूरकर देखा और फौरन दोनों हाथों से उसके उभरे हुए सीने को मसलने लगा-''कसम वाहे गुरु की,बड़ी जानदार औरत हो!''

कुलवन्त कौर ने एक अदा के साथ ईशरसिंह के हाथ एक तरफ झटक दिये और पूछा, ''तुम्हें मेरी कसम, बताओ कहाँ रहे?-शहर गये थे?''

ईशरसिंह ने एक ही लपेट में अपने बालों का जूड़ा बनाते हुए जवाब दिया, ''नहीं।''
कुलवन्त कौर चिढ़ गयी, ''नहीं, तुम जरूर शहर गये थे-और तुमने बहुत-सा रुपया लूटा है, जो मुझसे छुपा रहे हो।''

''वह अपने बाप का तुख्म हो, जो तुमसे झूठ बोले।''
कुलवन्त कौर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी, लेकिन फौरन ही भड़क उठी, ''लेकिन मेरी समझ में नहीं आता उस रात तुम्हें हुआ क्या?-अच्छे-भले मेरे साथ लेटे थे। मुझे तुमने वे तमाम गहने पहना रखे थे, जो तुम शहर से लूटकर लाए थे। मेरी पप्पियाँ ले रहे थे। पर जाने एकदम तुम्हें क्या हुआ, उठे और कपड़े पहनकर बाहर निकल गये।''

ईशरसिंह का रंग जर्द हो गया। कुलवन्त ने यह तबदीली देखते ही कहा, ''देखा, कैसे रंग पीला पड़ गया ईशरसियाँ, कसम वाहे गुरु की, जरूर कुछ दाल में काला है।''

''तेरी जान कसम, कुछ भी नहीं!''
ईशरसिंह की आवांज बेजान थी। कुलवन्ता कौर का शुबहा और ज्यादा मजबूत हो गया। ऊपरी होंठ भींचकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ''ईशरसियाँ, क्या बात है, तुम वह नहीं हो, जो आज से आठ रोज पहले थे।''

ईशरसिंह एकदम उठ बैठा, जैसे किसी ने उस पर हमला किया था। कुलवन्त कौर को अपने मजबूत बाजुओं में समेटकर उसने पूरी ताकत के साथ झ्रझोड़ना शुरू कर दिया, ''जानी, मैं वहीं हूं-घुट-घुट कर पा जफ्फियाँ, तेरी निकले हड्डाँ दी गर्मी।''

कुलवन्त कौर ने कोई बाधा दी, लेकिन वह शिकायत करती रही, ''तुम्हें उस रातया हो गया था?''
''बुरे की मां का वह
हो गया था!''
''बताओगे नहीं?''
''कोई बात हो तो बताऊँ।''


''मुझे अपने हाथों से जलाओ, अगर झूठ बोलो।''
ईशरसिंह ने अपने बाजू उसकी गर्दन में डाल दिये और होंठ उसके होंठ पर गड़ा दिए। मूँछों के बाल कुलवन्त कौर के नथूनों में घुसे, तो उसे छींक गयी। ईशरसिंह ने अपनी सरदी उतार दी और कुलवन्त कौर को वासनामयी नंजरों से देखकर कहा, ''आओ जानी, एक बाजी ताश की हो जाए।''


कुलवन्त कौर के ऊपरी होंठ पर पसीने की नन्ही-नन्ही बूंदें फूट आयीं। एक अदा के साथ उसने अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमायीं और कहा, ''चल, दफा हो।''
ईशरसिंह ने उसके भरे हुए कूल्हे पर जोर से चुटकी भरी। कुलवन्त कौर तड़पकर एक तरफ हट गयी, '' कर ईशरसियाँ, मेरे दर्द होता है!''

ईशरसिंह ने आगे बढ़कर कुलवन्त कौर की ऊपरी होंठ अपने दाँतों तले दबा लिया और कचकचाने लगा। कुलवन्त कौर बिलकुल पिघल गयी। ईशरसिंह ने अपना कुर्ता उतारकर फेंक दिया और कहा, ''तो फिर हो जाए तुरप चाल।''

कुलवन्त कौर का ऊपरी होंठ कँपकँपाने लगा। ईशरसिंह ने दोनों हाथों से कुलवन्त कौर की कमींज का बेरा पकड़ा और जिस तरह बकरे की खाल उतारते हैं, उसी तरह उसको उतारकर एक तरफ रख दिया। फिर उसने घूरकर उसके नंगे बदन को देखा और जोर से उसके बाजू पर चुटकी भरते हुए कहा-''कुलवन्त, कसम वाहे गुरु की! बड़ी करारी औरत हो तुम।''

कुलवन्त कौर अपने बाजू पर उभरते हुए Žबे को देखने लगी। ''बड़ा जालिम है तू ईशरसियाँ।''


ईशरसिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्काया, ''होने दे आज जालिम।'' और यह कहकर उसने और जुल्म ढाने शुरू किये। कुलवन्त कौन का ऊपरी होंठ दाँतों तले किचकिचाया, कान की लवों को काटा, उभरे हुए सीने को भँभोडा, भरे हुए कूल्हों पर आवांज पैदा करने वाले चाँटे मारे, गालों के मुंह भर-भरकर बोसे लिये, चूस-चूसकर उसका सीना थूकों से लथेड़ दिया। कुलवन्त कौर तेंज आँच पर चढ़ी हुई हांड़ी की तरह उबलने लगी।
लेकिन ईशरसिंह उन तमाम हीलों के बावजूद खुद में हरकत पैदा कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थे, सबके-सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिये,परन्तु कोई कारगर हुआ। कुलवन्त कौर के सारे बदन के तार तनकर खुद--खुद बज रहे थे, गैरजरूरी छेड़-छाड़ से तंग आकर कहा, ''ईश्वरसियाँ, काफी फेंट चुका है, अब पत्ता फेंक !''

यह सुनते ही ईशरसिंह के हाथ से जैसे ताश की सारी गड्डी नीचे फिसल गयी। हाँफता हुआ वह कुलवन्त के पहलू में लेट गया और उसके माथे पर सर्द पसीने के लेप होने लगे।

कुलवन्त कौर ने उसे गरमाने की बहुत कोशिश की, मगर नाकाम रही। अब तक सब कुछ मुंह से कहे बगैर होता रहा था, लेकिन जब कुलवन्त कौर के क्रियापेक्षी अंगों को सख्त निराशा हुई तो वह झल्लाकर पलंग से उतर गयी। सामने खूँटी पर चादर पड़ी थी, उसे उतारकर उसने जल्दी-जल्दी ओढ़कर और नथुने फुलाकर बिफरे हुए लहजे में कहा, ''ईशरसियाँ, वह कौन हरामजादी है, जिसके पास तू इतने दिन रहकर आया है और जिसने तुझे निचोड़ डाला है?''


कुलवन्त कौर गुस्से से उबलने लगी, ''मैं पूछती हूं, कौन है वह चड्डो-है वह उल्फती, कौन है वह चोर-पत्ता?''
ईशरसिंह ने थके हुए लहजे में कहा, ''कोई भी नहीं कुलवन्त, कोई भी नहीं।''

कुलवन्त कौर ने अपने उभरे हुए कूल्हों पर हाथ रखकर एक दृढ़ता के साथ कहा-''ईशरसियाँ! मैं आज झूठ-सच जानकर रहूँगी-खा वाहे गुरु जी की कसम-इसकी तह में कोई औरत नहीं?''

ईशरसिंह ने कुछ कहना चाहा, मगर कुलवन्त कौर ने इसकी इजाजत दी,
''कसम खाने से पहले सोच ले कि मैं भी सरदार निहालसिंह की बेटी हूं तक्का-बोटी कर दूँगी अगर तूने झूठ बोला-ले, अब खा वाहे गुरु जी की कसम-इसकी तह में कोई औरत नहीं?''

ईशरसिंह ने बड़े दु: के साथ हाँ में सिर हिलाया। कुलवन्त कौर बिलकुल दीवानी हो गयी। लपककर कोने में से किरपान उठायी। म्यान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और ईशरसिंह पर वार कर दिया।

आन-की-आन में लहू के फव्वारे छूट पड़े। कुलवन्त कौर को इससे भी तसल्ली हुई तो उसने वहशी बिल्लियों की तरह ईशरसिंह के केश नोचने शुरू कर दिये। साथ-ही-साथ वह अपनी नामालूम सौत को मोटी-मोटी गालियाँ देती रही। ईशरसिंह ने थोड़ी देर बाद दुबली आवांज में विनती की, ''जाने दे अब कुलवन्त, जाने दे।''

आवांज में बला का दर्द था। कुलवन्त कौर पीछे हट गयी।

खून ईशरसिंह के गले में उड़-उड़ कर उसकी मूँछों पर गिर रहा था। उसने अपने काँपते होंठ खोले और कुलवन्त कौर की तरफ शुक्रियों और शिकायतों की मिली-जुली निगाहों से देखा।

''मेरी जान, तुमने बहुत जल्दी की-लेकिन जो हुआ, ठीक है।''


कुलवन्त कौर कीर् ईष्या फिर भड़की, ''मगर वह कौन है, तेरी मां?''
लहू ईशरसिंह की जबान तक पहुँच गया। जब उसने उसका स्वाद चखा तो उसके बदले में झुरझुरी-सी दौड़ गयी।

''और मैं...और मैं भेनी या : आदमियों को कत्ल कर चुका हूं-इसी किरपान से।''

कुलवन्त कौर के दिमाग में दूसरी औरत थी-''मैं पूछती हूं कौन है वह हरामजादी?''

ईशरसिंह की आँखें धुँधला रही थीं। एक हल्की-सी चमक उनमें पैदा हुई और उसने कुलवन्त कौर से कहा, ''गाली दे उस भड़वी को।''

कुलवन्त कौर चिल्लायी, ''मैं पूछती हूं, वह कौन?''

ईशरसिंह के गले में आवांज रुँध गयी-''बताता हूं,'' कहकर उसने अपनी गर्दन पर हाथ फेरा और उस पर अपनी जीता-जीता खून देखकर मुस्कराया, ''इनसान माइयाँ भी एक अजीब चीज है।''

कुलवन्त कौर उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी, ''ईशरसिंह, तू मतलब की बात कर।''

ईशरसिंह की मुस्कराहट उसकी लहू भरी मूँछों में और ज्यादा फैल गयी, ''मतलब ही की बात कर रहा हूं-गला चिरा हुआ है माइयाँ मेरा-अब धीरे-धीरे ही सारी बात बताऊँगा।''

और जब वह बताने लगा तो उसके माथे पर ठंडे पसीने के लेप होने लगे, ''कुलवन्त ! मेरी जान-मैं तुम्हें नहीं बता सकता, मेरे साथ क्या हुआ?-इनसान कुड़िया भी एक अजीब चीज है-शहर में लूट मची तो सबकी तरह मैंने भी इसमें हिस्सा लिया-गहने-पाते और रुपये-पैसे जो भी हाथ लगे,

वे मैंने तुम्हें दे दिये-लेकिन एक बात तुम्हें बतायी?''

ईशरसिंह ने घाव में दर्द महसूस किया और कराहने लगा। कुलवन्त कौन ने उसकी तरफ तवज्जह दी और बड़ी बेरहमी से पूछा, ''कौन-सी बात?''ईशरसिंह ने मूँछों पर जमे हुए जरिए उड़ाते हुए कहा,

''जिस मकान पर...मैंने धावा बोला था...उसमें सात...उसमें सात आदमी थे-: मैंने कत्ल कर दिये...इसी किरपान से, जिससे तूने मुझे...छोड़ इसे...सुन...एक लड़की थी, बहुत ही सुन्दर, उसको उठाकर मैं अपने साथ ले आया।''

कुलवन्त कौर खामोश सुनती रही। ईशरसिंह ने एक बार फिर फूँक मारकर मूँछों पर से लहू उड़ाया-कुलवन्ती जानी, मैं तुमसे क्या कहूँ, कितनी सुन्दर थी-मैं उसे भी मार डालता, पर मैंने कहा, ''नहीं ईशरसियाँ, कुलवन्त कौर ते हर रोज मजे लेता है, यह मेवा भी चखकर देख!''

कुलवन्त कौर ने सिर्फ इस कदर कहा, ''हूं।''

''और मैं उसे कन्धे पर डालकर चला दिया...रास्ते में...क़्या कह रहा था मैं...हाँ, रास्ते में...नहर की पटरी के पास, थूहड़ की झाड़ियों तले मैंने उसे लिटा दिया-पहले सोचा कि फेंटूँ, फिर खयाल आया कि नहीं...'' यह कहते-कहते ईशरसिंह की जबान सूख गयी।

कुलवन्त ने थूक निकलकर हलक तर किया और पूछा, ''फिर क्या हुआ?''

ईशरसिंह के हलक से मुश्किल से ये शब्द निकले, ''मैंने...मैंने पत्ता फेंका...लेकिन...लेकिन...''

उसकी आवांज डूब गयी।

कुलवन्त कौर ने उसे झिंझोड़ा, ''फिर क्या हुआ?''

ईशरसिंह ने अपनी बन्द होती आँखें खोलीं और कुलवन्त कौर के जिस्म की तरफ देखा, जिसकी बोटी-बोटी थिरक रही थी-''वह...वह मरी हुई थी...लाश थी...बिलकुल ठंडा गोश्त...जानी, मुझे अपना हाथ दे...!''


कुलवन्त कौर ने अपना हाथ ईशरसिंह के हाथ पर रखा जो बर्फ से भी ज्या