Thursday, 9 December 2021

अपराजिता: कहानी उस स्त्री की, जिसने हारना नहीं सीखा (लेखिका: शिवानी)

आरती ने अपना चेहरा दर्पण में देखा और फिर सिहरकर दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया. दर्पण में, अपने सांवले, साधारण चेहरे के साथ, उसे उसी प्रतिबिम्ब की प्रेतछाया फिर त्रस्त कर गई थी, जिसने उसे कई रातों से सोने नहीं दिया था.

 

यह अदर्शी प्रतिबिम्ब, उसे बार-बार अंगूठा दिखाकर कह रहा था,‘क्या खाकर मेरी बराबरी करोगी, आरती सक्सेना! प्रतिभा को तो मनुष्य अपने परिश्रम से भी संवार सकता है, किन्तु कितना ही परिश्रम क्यों कर ले, विधाता के दिए कुत्सित चेहरे को वह क्या संवार सकता है? देख लिया है ना मेरा चेहरा? मेरे यौवन, मेरे सौन्दर्य के सम्मुख अब क्या तुम्हारी अफ़सरी टिक सकती है?’

 

आरती की सूजी आंखों की पलकें, अभी भी अश्रुसिक्त थीं क्या कहेगी वह अब अपने मित्रों से? फिर मित्र भी क्या उसके साधारण स्तर के थे? वह कुछ भी कहें, तब भी उसके उदास चेहरे की एक-एक रेखा को वे खुली पुस्तक-सा ही बांच लेने में समर्थ थे. आरती की असाधारण प्रतिभा के स्तर के मित्र जुटना भी सहज नहीं था.

 

अपने गहन अध्ययन, अनुपम शौर्य एवं असाधारण योग्यता के ही कारण आज वह सचिवालय की उस ऊंची कुर्सी पर आसीन थी. इसी से, उन्नत नासिका या कर्णचुम्बी आयत नयनों के अभाव में भी, उसका साधारण चेहरा एक अनोखी ही आभा से बुद्धिदीप्त रहता.

 

वैसे देखा जाता, तो वह देखने में साधारण ही नहीं, साधारण के स्तर से भी बहुत नीचे ही उतरती थी. संकुचित ललाट, जुड़ी घनी भौंहें, और तीखे तेवर उसे और भी उग्र बनाकर देखनेवाले को सहमा देते.

 

उसका एकमात्र दर्शनीय अवयव, उसकी शरबती आंखें थीं, जो परिवेश के साथ क़दम मिलातीं, बिजली की गति से, अपना रूप बदलती रहती थीं. जहां प्रणयी पति को देखते ही उन बड़ी मद-भरी आंखों में रस का सागर छलकने लगता वहीं पर कलुआ जैसे कुख्यात तस्कर को कभी उन्हीं तरल आंखों के सहसा ज्वालामुखी बन उठे अग्निगर्भा तेज ने पक्षाघात का-सा झटका दे दिया था.

 

जब, आरती ने उस छोटे-से पिछड़े इलाक़े में, अपने आबकारी विभाग की कलक्टरी का पदभार पहली बार संभाला था, वह रूखी मर्दानी अफ़सर जितनी ही कर्मठ, योग्य थी, उतनी ही ईमानदार और प्रतिभा-सम्पन्न थी.

एक तस्कर ने तो, उसे पकड़े जाने पर, पचास हज़ार के उत्कोच का प्रलोभन भी दिखाया था, किन्तु शायद वह रुपए के लिए, निरीह सम्पन्न महाजनों के प्राण हरनेवाला हृदयहीन डकैत नहीं जानता था कि रुपए के मोह ने आरती सक्सेना को कभी उसकी कर्तव्यनिष्ठा से नहीं डिगाया.

 

चाहती, तो वह उसी क्षण, पल-पल दुगुनी घोषित की जा रही उत्कोचराशि को ग्रहण कर, जीवन-भर अपने रूपवान कृशकाय सहचर के साथ, चैन की बंसी बजा सकती थी. फिर तो, रात-आधी रात को, किसी की सुदूरस्थित ग्राम में तस्करों के अड्डे का सन्धान पाते ही, वह गुर्राती भूखी नरभक्षिणी-सी ही, शिकार की खोज में निकलने लगी.

 

एक तो उसका ज़िला नेपाल की सरहद से सटा था, उस पर सीमान्त का गहन अरण्य उनका प्रिय अड्डा था. चार ही महीनों में उसने तीन छापे मारकर लाखों की हशीश, अफीम बरामद कर ली थी. एक दिन, वह ऐसे ही थकानप्रद दौरे से, जीप धड़धड़ाती अपने बंगले में पहुंची ही थी कि तहसील का एक धूर्त नापित उसे सूचना दे गया थाकलुआ हमारे ही गांव के ठाकुरों की बरात में आया है सरकार, पूरे साठ-सत्तर हजार का माल लिए है.’

 

कलुआ के आतंक ने उन दिनों समीपस्थ प्रत्येक ग्राम को थर्राकर रख दिया था. वह एक कुख्यात तस्कर ही नहीं, एक नृशंस डकैत भी था. दिन-दहाड़े, समृद्ध ग्रामीणों के यहां अपनी बहुमूल्य पोटलियां छिपा, वह प्रतिवेशी ग्रामों की समृद्धि को, किसी गर्त में छिपाए हड्डी के टुकड़े की भांति सूंघता, चोर कुत्ते-सा ही पहुंच जाता और बल्लम-भाले, देशी बारूद के धमाके से, पूरे ग्राम को आतंकित कर, सम्पन्न श्रीमन्त को भी पथ का भिखारी बना जाता.

 

कहा जाता था कि उसके अचूक निशाने की कीर्ति से ही सहमकर, कोई भी पुलिस की टुकड़ी उससे आज तक मोर्चा नहीं ले पाई थी. उसी अचूक निशाने के स्वामी को, अपने अचूक निशाने से पराजित कर, दुःसाहसी आरती सक्सेना ने, अपने पूरे ज़िले को अपनी खाकी ट्यूनिक की जेब में डाल लिया था.

 

वह जब भी छापा मारने निकलती, हमेशा मर्दानी वर्दी का ही परिधान धारण किए रहती, साड़ी के छहगजी जंजाल में, अपनी प्रशासकीय योग्यता को उलझाना उसे पसन्द नहीं था, इसीलिए उसने अपने ऐसे शत्रुसन्धानी दौरों के लिए एकसाथ कई खाकी वर्दियां सिला ली थीं. पौरुष को वह अपने अर्जित पौरुष से ही, आज तक पराजित करती चली आई थी.

 

वह इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखती थी कि किसी नन्ही-सी तुरपन से भी, नारी की ललित-ललाम छटा छिटक पाए! दूर से देखने पर तो, किसी भी अपरिचित को, उसे देख किसी रोबदार, गठीले पुरुष का भी भ्रम हो सकता था.

Shivani--Writer of this dtory "Aprajita"


एक बार तो, उसके एक मित्र की नन्ही पुत्री ने कह दिया, ‘हाय बुआ, आप अगर वो आठ आनेवाली नकली मूंछें लगा लें तो और भी अच्छी लगेंगी.’

 

कलुआ के अड्डे पर छापा मारने भी वह अपनी उसी मर्दानी वर्दी में निकल पड़ी थी. फिर जिस छल-बल से, वह साक्षात् चामुण्डा का रूप धारण कर, उस चिक्षुर से मोर्चा लेने, अपने गणों सहित, उस ग्राम में पहुंची और छिपकर, पेड़ के पत्तों से एकाकार हो गई, वह घटना पूरे शहर में एक दन्तकथा बन गई थी.

 

विदेशी ठर्रे और बनैले सुअर के तामसी अपच से उन्मत्त कलुआ, बरातियों का मनोरंजन, उसी की गुणगाथा से कर रहा थाअजी, यहां कैसे-कैसे अफसरों को थूक चटा दिया, यह तीन कौड़ी की मेहरारू क्या खाकर कलुआ से जूझेगी! सूई उछालकर भी, अपने निशाने से उड़ा सकता है कलुआ! किसकी छाती में हैं इतने बाल जो इस छाती को बन्दूक के धमाके से दागे!’

 

वह बड़े गर्व से, अपनी लोमश छाती का प्रदर्शन कर ही रहा था कि पत्तों के गहन अन्तराल से सन्नाती गोली उसकी कनपटी का स्पर्श करती एक पल को, उसकी बोलती बन्द कर गई. फिर तो, कलुआ का वीभत्स चेहरा और भी वीभत्स हो उठा था.

 

देखते-ही-देखते विवाह का मंडप ख़ाली हो गया, कच्ची मिट्टी के बने घरों के द्वार पटापट बन्द हो गए, पर उस भगदड़ के बीच भी, कलुआ अपनी वनकेसरी की-सी गर्जना से दिशाएं गुंजाने लगा था,‘मर्द है तो सामने आकर लड़, जनखों की तरह छिपकर गोली क्यों चलाता है?’

 

वह अब बन्दूक ताने, दांत पीसता शत्रु के शरसन्धान की दिशा को ढूंढ़ने लगा था. मर्द होकर भी वह जवांमर्द के ही साहस से पेड़ से कूद गई थी. आमने-सामने की टक्कर में पहली बार, उस अचूक निशानेबाज़ का निशाना आरती के कन्धों को छूता व्यर्थ निकल गया था.

 

उसका एक कारण और भी था, जिसने सर्वदा पुरुष-प्रतिद्वंद्वी की ही आग उगलती आंखें देखी थीं, वह एक क्षण को उस अन्धकार में किसी वन्य-पशु की-सी जलती उन आंखों के अस्वाभाविक तेज से, सहसा चैकन्ना हो गया था.

फिर उत्तेजना, क्रोध और पेड़ से लगाई गई ऊंची छलांग ने आरती का ढीला बंधा जूड़ा खोलकर कन्धों पर बिखेर दिया था.

 

खुले केश, तमतमाया चेहरा और आरक्त चक्षुओं की उस ज्वलन्त दृष्टि ने कलुआ का सन्तुलन छीन लिया. उसके मोटे होंठों से भद्दी अश्लील गाली आधी ही निकली थी कि आरती की कुमुक ने उसे घेरकर जकड़ लिया. आरती को प्रशस्ति तो प्रचुर मिली ही थी, साथ ही उसके अनुपम शौर्य-प्रदर्शन ने उसे उसी दिन से, पुरुष सहकर्मियों की बिरादरी में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश की अनुमति दे दी थी.

 

उसकी स्वयं की महिमा के साथ-साथ फिर निरन्तर उसके पद की गरिमा भी बढ़ती ही चली गई थी. कुछ अंशों में, आरती की योग्यता को उसके सुखी दाम्पत्य जीवन ने ही घिस-मांजकर और भी परिष्कृत कर दिया था; उसके निकटतम मित्रों को भी कभी-कभी आश्चर्य होता कि एक़दम ही अनमोल जोड़ी होने पर भी, दोनों में स्वाभाविक खटपट तो दूर, सामान्य-सी बहस भी कभी नहीं होती थी.

 

लगता था, दोनों ने ही बड़ी समझदारी से कुछ ऐसा समझौता कर लिया था कि उनके जीवन में एक दर्शनीय मशीनी तत्परता गई थी. दिन-भर दोनों समानान्तर रेखाओं-से विलग रहते और सन्ध्या होते ही वे दो रेखाएं एक-दूसरे का अस्तित्व मिटा एकाकार हो जातीं. दोनों के स्वभाव में कोई साम्य था; चेहरे-मोहरे और शरीर की बनावट में ही!

 

आरती हृष्ट-पुष्ट ऊंची महिला थी, उसके मदाक्रान्त प्रौढ़त्व ने, समय से कुछ पूर्व ही किसी बिन बुलाए अवांछित अतिथि की भांति टपककर, उसके यौवन को दुःसाहस से पीछे ढकेल दिया था, जीवन के तैंतीस वसन्तों में ही कनपटी के बालों से सफेदी झांकने लगी थी, सचिवालय के कठिन कार्यभार ने, चेहरे को सिकोड़ दिया था, पुरुषों के निरन्तर साहचर्य से, उठने-बैठने, हंसने-बोलने में पुरुषोचित गरिमा गई थी.

 

अराल अंगुलियों को, यत्न से किया गया मैनीक्योर भी, अब नहीं संवार पाता था, दिन-भर कलम पकड़ने से, अंगुलियों में गांठें उभर आई थीं. फिर भी, उसकी सज्जा, वाणी, हंसी में कहीं भी शैथिल्य नहीं रहता.

 

वहीं पर उसके पति रामभजन सक्सेना के नाम में ही किसी अर्दली के-से नाम की खनक नहीं थी, पूरे व्यक्तित्व में ही सदैव, किसी दीवार के ढह पड़ने का-सा खतरा बना रहता. आरती प्राणान्तक चेष्टा से ही अपने उस निपट गंवार पति को एक सुसंस्कृत नागरिक बना पाई थी.

 

पितृगृह की समृद्धि में पालिता आरती, ब्याहकर ससुराल आई तो उसका यही सुदर्शन सहचर, मुंह में दतौन दबा, लोटा लेकर दिशा-जंगल जाया करता था. नाम का तो ग्रेजुएट था, किन्तु सभ्य शिष्टाचार की वर्णमाला से, उसका सामान्य-सा भी परिचय नहीं था. अंग्रेज़ी बोलना तो दूर, पढ़ने में भी वह बुरी तरह हकलाता था.

 

उसी देहाती भजन का कायाकल्प कर दिया था आरती ने. शरीर अभी भी कृश था, किन्तु उसकी वही कृशता उसके सुकुमार चेहरे को और भी कमनीय बना देती थी, वह ऐसा चेहरा था, जिसे कभी पारसी थिएटर कम्पनियां सजा-धजाकर, नारी रूप में अवतरित कर, लाखों दर्शकों के हृदय विजित किया करती थीं.

 

आरती के लिए वह भोला पति एक मोहक शिशु-सा ही था, जिसे तरह-तरह के उपहारों से लादकर भी, उसे कभी पूर्ण सन्तोष नहीं होता था और वह भी, पत्नी-प्रदत्त प्रत्येक अलभ्य दामी उपहार के हाथ में आते ही, अबोध शिशु-सा ही किलक उठता. कहीं भी कोई अच्छा कपड़ा देखती, आरती चट से भजन के लिए ख़रीद लेती, चैक की जाने किन-किन संकरी गलियों में घूम, वह उसके लिए चिकन के जालीदार कुर्ते बनवाती, कहीं से कारचोबी के नागरा बनवा लाती और कहीं से कोल्हापुरी चप्पलें.

 

पत्नी की कलात्मक सुरुचि बेजोड़ थी और उसी का संस्पर्श, उसके मोम की डली-से पति को भी लग गया था. कान्वेंट शिक्षिता आरती की त्रुटिहीन उच्चारण ही भजन की जिह्म पर नहीं उतरा, उसके अदब, कायदे, नम्रता, शिष्टाचार की छाया भी, उसे निरन्तर अपने आरक्षण में घेरे, साथ-साथ चलने लगी थी.

 

आरती की दृष्टि में, उसके पति का सबसे बड़ा आकर्षण था नारीमात्र के प्रति उसकी उदासीनता.

 

 उसकी मित्र-पत्नियां, मिलनेवालियों में एक-से-एक आकर्षक मुखरा-चपला उर्वशियां थीं, किन्तु मजाल थी कि कभी भजन उनसे हंसी-चुहल तो कर ले! नारी-रूप की प्रेरणाशक्ति उसके भोले महादेव का कभी स्पर्श भी नहीं कर पाती थी. उसका संसार, उसका प्रणय-निवेदन केवल अपनी रोबदार पत्नी तक ही सीमित था, वही उसकी एकमात्र उपास्य थी और वह उसका एकमात्र उपासक!

 

जब तक सास जीवित रहीं, आरती की त्रुटिहीन सेवा के बावजूद, उससे असन्तुष्ट ही रहीं,‘हम तो उसी दिन जान गई थीं, जब बचुआ उन्हें ब्याह के लाए थे. अजी, कुछ जनानी लकार हो तो गोद भी भरे!’ वैसे बचुआ, उसे अपने मन से ब्याहकर नहीं लाए थे, उनके दूरदर्शी पिता ने ही उन्हें वह उपहार भेंट किया था.

 

आकण्ठ कर्ज में डूबे, मुंशीजी का वह अकर्मण्य मन्दबुद्धि पुत्र, कई असफलताओं के पश्चात, ग्रैजुएट बन पाया था, फिर पिता के ही एक मित्र ने, उसके लिए वनस्पति घी फ़ैक्टरी में एक छोटी-मोटी नौकरी भी ढूंढ़ दी थी. जब कर्जदारों ने मुंशीजी के द्वार खटखटाकर कुंडी का लगभग उन्मूलन ही कर दिया था और गिरवी पड़े मकान की कुर्सी का भय, उन्हें बुरी तरह त्रस्त कर रहा था, तभी यह रिश्ता आया था.

 

पहले तो वह चौंके, फिर उनका विवेक जाग्रत हो गया. रिश्ता उन्हें मंजूर था, पर तगड़े तिलक के अतिरिक्त, अपने सुदर्शन पुत्र की अन्तिम नीलामी बोली में, वह चाहते थे कि समधी उनका पूरा कर्ज़ उतार बंधक पड़ा पुश्तैनी मकान भी छुड़ा दें. आरती के पिता, अवकाशप्राप्त ज़िलाधीश थे, किन्तु अवकाशप्राप्ति-पूर्व नौकरी ने, उन्हें जिन-जिन ज़िलों का सम्राट बनाया, वहां-वहां से उन्होंने महमूद गजनवी की-सी ही हृदयहीनता से, लूट-पाटकर यथेष्ट समृद्धि बटोरी थी.

 

फिर आरती उनकी एकमात्र सन्तान थी. यह विधाता का सरासर अन्याय था कि पुत्री के चेहरे को वह सामान्य-सा लावण्य भी नहीं प्रदान कर सके, नहीं तो आज पढ़ी-लिखी पुत्री को, उन्हें ऐसे बहाना पड़ता! सुदर्शन जामाता के कमनीय चेहरे पर रीझकर ही उन्होंने यह रिश्ता भेजा था.

 

बुड्ढा डाइबिटिक था और बुढ़िया को दिल का पुराना रोग़ था, आख़िर सास-ससुर कितने दिन जिएंगे? ईश्वर ने चाहा तो कुछ ही दिनों में बेटी का मैदान साफ़ हो जाएगा और वे भजन को गृह-जामाता बना, अपने गृह का स्थायी सदस्य बना लेंगे. किन्तु जब उनकी काल्पनिक योजना साकार हुई तो उनके भजन को स्थायी सदस्य बनाने के सपने मिट्टी में मिल गए.

 

माता-पिता को एकसाथ ही ट्रेन-दुर्घटना में खोकर आरती विक्षिप्त-सी हो गई थी. किन्तु कठिन-से-कठिन परिस्थितियों से भी उसने आज तक कभी हार नहीं मानी थी. ससुराल का बेढंगा मकान बेच, उसने पिता की कोठी को किराए पर उठा दिया, फिर पति की नाममात्र की नौकरी छुड़वा, उसे साथ लेकर वह अपनी नौकरी संभालने चल दी.

 

भजन का वास्तविक कायाकल्प, उसके इसी निरंकुश राज्यकाल से आरम्भ हुआ था. उसकी अप्रतिम खिसियायी हंसी को, बरबस धारण कराए गए मौनव्रत ने मिटा दिया, अकारण की गुनगुनाहट, और बीच-बीच में कन्धे उचकाने के बद-अभ्यास को भी, रोबदार पत्नी की कनखियों की मार ने, सदा के लिए मुक्ति दिला दी.

 

यही नहीं, रात-रात पढ़ाकर, आरती ने उसे जाने कब एमए की परीक्षा भी ठेल-ठालकर उत्तीर्ण करा दी. फिर तो अपनी मित्र-मंडली में वह अपने पति का परिचय पठन-पाठन प्रेमी विद्वान के रूप में देने लगी,‘इन्हें क्या कभी अपनी रिसर्च से फ़ुर्सत मिलती है? जब देखो तब मोटी-मोटी किताबें लिए किसी कोने में बैठे रहते हैं!’

 

वास्तविकता एक़दम उसके कथन के विपरीत होती. बेचारा भजन कोने में स्वेच्छा से नहीं बैठता था, उसे बैठा दिया जाता था, जिससे आरती की बौद्धिक गोष्ठी के बीच, वह कहीं अपना कोई सस्ता-सा चुटकुला सुना बैठे.

 

एक-दो बार वह आरती को, उसके मित्रों के सम्मुख ऐसे चुटकुले सुनाकर, बुरी तरह अपदस्थ कर चुका था. आरती एक लोकप्रिय वरिष्ठ अफ़सर थी. आए दिन उसके यहां गोष्ठी जमती, उसकी मौलिक परिहासप्रियता, आनन्दी स्वभाव, उदार मेज़बानी उसकी गोष्ठियों को और भी मधुर बना देती.

 

उसके दिए गए सहभोजों की शहर में विशेष ख्याति थी, जब भी उसके यहां पार्टी होती, वह रुपया पानी की भांति बहा देती. भजन, ऐसे अवसरों पर, अपनी पूरी सामर्थ से जुट जाता. जाने किन-किन मंडियों में घूम-घूमकर पसेरियों में सब्ज़ी खरीदता, फिर स्वस्थ बकरे की एक-एक रान की जांच-परख कर बोटियां कटवाता.

 

यहां तक कि मसाला पीसने में भी उसे नौकर पर विश्वास नहीं होता! आरती दफ़्तर से लौटती तो देखती कच्छा-बनियान पहने वह सिल-बट्टे से जूझता, पसीना-पसीना हो रहा है. ‘भजन, दिस इज़ टू मच! तुम इन हरामखोर पड़ोसियों को नहीं जानते! कहीं जान गए तो मेरी ही बदनामी करेंगे,’ वह कहती.

 

किसे क्या पता कि हमने मसाले पीसे हैं,’ वह बड़े भोलेपन से हंसकर फिर मसाला पीसने लगता.

 

बहादुर ने तो देख लिया है, घर का भेदी, हर नौकर विभीषण होता है भजन. किसी ने कभी फुसलाया तो चट से उगल आएगा कि मेमसाहब साहब से मसाले भी पिसवाती हैं.’

 

कभी-कभी आरती रुआंसी हो जाती. पर भजन को किसी के कहने-सुनने की चिन्ता नहीं रहती. जब आरती ड्राइंग रूम की और अपनी सज्जा में व्यस्त रहती, वह रायते के लिए दही मथ रहा होता.

 

घर का नेपाली नौकर बहादुर ही उसका एकमात्र मित्र था, उसे भी यह मसाला पीसनेवाला, मेम साहब के ब्लाउज पेटी-कोट में इस्तरी करनेवाला साहब बहुत पसन्द था. उसे कभी डांटता, डपटता. आरती को कभी-कभी मीटिंग से लौटने में बड़ी देर हो जाती तो देखती, स्वामी और भृत्य दोनों परमानन्द से रेडियो लगाकर फ़िल्मी गाने सुन रहे हैं.


 

कितनी भाग्यवान हो तुम आरती!’ उसकी मित्र सीमा चक्रवर्ती कहती थी,‘तुम्हारे पति की जगह कहीं मेरा हरेन्द्र होता तो ऐसी दावत के बाद मेरी खैर नहीं रहती. तुम तो जानती ही हो, वह एलाइड में है और मैं आईएएस हूं. इस कॉम्प्लेक्स से वह कभी मुक्त नहीं हो पाता. कई दावतें ऐसी होती हैं, जहां केवल मुझे ही निमन्त्रित किया जाता है. बस, फिर यह समझ लो कि पूरा महीना-भर वह दावत मेरे सिर से निकलती रहती है…’

 

आरती गर्व से मुस्करा देती, किन्तु सहसा एक ही रात में वह उसकी सहज स्वाभाविक गर्वोन्मत्त मुस्कराहट सूखे अधरों पर ही सूखकर विलुप्त हो गई थी. आज पहली बार जीवनोदधि की उद्धत आनन्दी तरंगों के बीच एक अदृश्य चट्टान की भयावह उपस्थिति उसे त्रस्त कर गई थी.

 

कुछ ही क्षणों में उसका जीवनपोत, उससे टकराकर चूर-चूर हो जाएगा. दिन-भर की क्लान्ति के पश्चात् कभी-कभी जब भजन अपने लजीले प्रणय-निवेदन के साथ, डरते-डरते उसे बांहों में खींचने की चेष्टा करता तो वह इस बुरी तरह से डपट देती कि बेचारा सहमकर पत्थर बन जाता, आज उन्हीं बांहों के विस्तृत घेरों में स्वयं ही सिमटकर खो जाने को उसका हृदय व्याकुल हो रहा था.

 

विवाह से पूर्व, डाइटिंग के चक्कर में जब वह ग्रास-भर खाना खाकर ही उठ जाती थी, तो उसकी मां उसे टोकती थी,‘बेटी, ऐसे ही खाना कम करोगी तो एक दिन आंतें सिकुड़ जाएंगी और भूख एक़दम ही मर जाएगी.’यही शायद भजन की अभूख का कारण भी था. उस क्षुधार्थ भिक्षुक को उसने ही तो तीव्र भर्त्सना से जाने कितनी बार द्वार से भूखा ही लौटा दिया था.

 

पर तब वह क्या जानती थी कि उसके शिशु-से सरल पति को उस मायावी गुरु का चक्कर बांध रहा है? कुछ महीनों से वह पति की विचित्र गतिविधि को देख शंकित अवश्य हुई थी, पर फिर अफ़सरों का शत्रु मार्च का महीना सिर पर चढ़ आया था, जाने कितने बिल, कितनी फ़ाइलें और चिड़ियाघर के बन्द पिंजरे में गुर्राते बब्बर शेर की-सी गर्जना में उसके सचिव कलेजा बीच-बीच में अलग ही धड़का रहे थे, क्या करती बेचारी.

 

थकी-मांदी आती और भजन से थोड़ा इधर-उधर की बातें कर सो जाती. अचानक एक दिन आरती की नींद टूटी तो देखा पार्श्व के पलंग से भजन ग़ायब है.उसने सोचा, शायद बाथरूम गया है, वह फिर नींद में डूब गई. थोड़ी देर बाद अपने कद्दावर एल्सेशियन का भौंकना सुन, वह चौंककर उठ बैठी.

 

पलंग अभी भी ख़ाली था. जिस कोने की ओर मुंह किए जैकी भौंक रहा था, उधर ही उसकी दृष्टि स्वयं मुड़ गई. जाने कब से उसके पार्श्व से उतर, भजन चटाई बिछा शीर्षासन की मुद्रा में मूर्ति-सा स्थिर उल्टा लटका था! उसकी सतर देह काठ-सी तनी थी, सिर के बालों ने लम्बोतरे चेहरे को पूरी तरह ढंक लिया था. जैकी स्वामी की परिचित देहगन्ध से भी आश्वस्त नहीं हो पा रहा था.

 

चुप कर जैकी.’आरती ने उसे झपटा, फिर अपनी झुंझलाहट को यथासाध्य संयत कर, उसने उल्टे लटके भजन के कान के पास मुंह सटाकर पुकाराभजन, भजन डार्लिंग!’

 

पर भजन डार्लिंग ने तो जैसे परमपद पा लिया था, संसार में होकर भी वह संसार में नहीं था. आरती का साहसी कलेजा भी बुरी तरह धड़क उठा. दिल्ली, मसूरी, मद्रास की वह अपनी सारी अफ़सरी कवायद भूल-बिसरकर रह गई.

 

बड़ी देर बाद वह सीधा होकर बैठा, तो आरती सहमकर स्वयं ही पीछे हट गई. यह तो उसका पति नहीं था! चेहरे पर की दिव्य मुसकान और अर्धोन्मीलित दृष्टि जाने किस अदृश्य शान्ति के सागर में डुबकियां लगा रही थी.


यह सब क्या कर रहे हो भजन, इतनी ठंड में नंगे बदन?’ वह चिन्तातुर-व्यग्र होकर पति को बरबस पार्श्व में खींच लाई और कम्बल उढ़ा दिया,‘यू हैव वेरी वीक चेस्ट भजन! याद नहीं पिछली बार इन्हीं दिनों तुम्हें ब्रांको-न्यूमोनिया हो गया था? इस बार कुछ हो गया तो मैं कुछ कर भी नहीं पाऊंगी. तुम्हें पता है ना, मुझे एक सेमिनार में नैनीताल जाना है!’

 

भजन ने कोई उत्तर नहीं दिया. बड़ी देर तक पति का हाथ मुट्ठी में कसकर दाबे-दाबे ही, आरती फिर गहरी नींद में डूब गई. जब उठी तो उसका पार्श्व पर्यंक फिर सूना था. उसने ड्रेसिंग गाउन डाला, सब कमरे देखे, बाथरूम देखा; फिर बहादुर की पेशी की.

क्यों बहादुर, साहब कहीं गए हैं क्या?’

 

उस एक प्रश्न को पूछने में, उस आत्मसम्मानी प्रखर नारी की कितनी ही सूखी सिसकियां कंठ-प्राचीर से टकरा-टकराकर, उसका कलेजा निचोड़ गई थीं! उसका पति, आज तक उससे बिना पूछे, कभी बाथरूम तक नहीं गया था, यह हरामखोर बहादुर भी जानता था. फिर उसी से, आज पति के पलायन की क़ैफियत मांगने में वह धरती में धंस गई थी.

 

जी, साब तो आजकल रोज दुपहर में गुरुजी के पास जाता है. आज जल्दी चला गया!’ उसका चपटा चेहरा स्वामी की कीर्ति से उद्भासित हो, और भी चपटा लगने लगा था.

 

गुरुजी? कौन गुरुजी?’

नागा बाबा है हजोर, तन पर बस्तर नहीं! साब हमको भी एक दिन ले गया था. कहता था बहादुर, हम भजनानन्द बन गया तो तुमको भी साथ ले जाएगा!’

 

आरती को लगा, वह बेहोश होकर उसी मूर्ख के सामने कहीं कोई दृश्य उपस्थित कर बैठे.

 

ठीक है, तुम नाश्ता तैयार करो साहब के आने पर ही मैं चाय पियूंगी.’

और जाने कब तक वह अवश कुर्सी में ही बैठी रही थी. जिसे उसने किसी जंगली भेड़िये की मांद से छुड़ाएबुल्फ बाय की ही भांति, अपने बुद्धि-नैपुण्य से, सुसंस्कृत समाज का सम्मानित सदस्य बना लिया था, वह उसके किस अयत्न से प्रताड़ित होकर, सहसा अनुशासन का बन्धन तोड़ गया था? जब वह लौटा, तो उसके नग्न तन पर, देहाती लाल अंगोछे का ह्नस्व परिधान देख, आरती का चेहरा तमतमा उठा.

 

कहीं उसकी सुरुचिपूर्ण मित्रों की बिरादरी उसे देख लेती, तो वह कहां मुंह छिपाती फिरती? किन्तु उस अद्भुत अनुशासनप्रिय नारी को, विधाता ने, हाथ में आई शक्ति का दुरुपयोग करना नहीं सिखाया था. हृदय क्रोध की उत्तुंग तरंगों से उद्वेलित होने पर भी, वह जिह्ना को संयम के अंकुश से साधने में समर्थ थी.

 

वह जानती थी कि व्यर्थ की चिल-गोहार मचाकर, वह अपने नौकर की, इधर-उधर बातें लगाने की प्रवृत्ति को ही प्रश्रय देगी. आज तक उसका विवाहाकाश दाम्पत्य-जीवन की कटुता से कभी म्लान नहीं हुआ.

 

आओ, भजन,’ उसने अपने मधुर स्मित से अपने निगरगंड सहचर का आह्नान किया,‘मैं कब से चाय लेकर बैठी हूं!’

 

नित्य की भांति, उस दिन भी आरती की मेज दर्पण-सी चमक रही थी. चांदी का टी-सेट, दो प्लेटों में पांच अंडे, कुरकुरे टोस्ट, पौरिज और चांदी की तश्तरी में मेवे.

 

कृपण पिता की अटूट धनराशि की, आरती के नित्यप्रति के भोजों में ऐसी ही तृतीय गति होती थी.