Saturday, 3 October 2020

A Short Story “Apne Dukh Mujhe De Do”--By Rajinder Singh Bedi

इंदू ने पहली बार एक नज़र ऊपर देखते हुए फिर आंखें बंद कर लीं और सिर्फ़ इतना कहा।जीउसे ख़ुद अपनी आवाज़ किसी पाताल से आई हुई सुनाई दी।

 

देर तक कुछ ऐसा ही होता रहा और फिर होले होले बात चल निकली।अब चली सो चली।वह थमने ही में आती थी।इंदू के पिता,इंदू की माँ, इंदू के भाई, मदन के भाई बहन, बाप, उनके रेलवे सेल सर्विस की नौकरी, उनके मिज़ाज, कपड़ों की पंसंद, खाने की आदत, भी का जाएज़ा लिया जाने लगा बीच बीच में मदन बात चीत को तोड़ कर कुछ और ही करना चाहता था लेकिन इंदू तरह दे जाती थी।

 

इंतिहाई मजबूरी और लाचारी में मदन ने अपनी माँ का ज़िक्र छेड़ दिया जो उसे सात साल की उम्र में छोड़ कर दिक़ के आरिज़े से चलती बनी थी।जितनी देर ज़िंदा रही बेचारीमदन ने कहा।बाबू जी के हाथ में दवाई की शीशियाँ रहीं।हम अस्पताल की सीढ़ियों पर और छोटा पाशी घर में च्यूटियों के बिल पर सोते रहे और आख़िर एक दिन 28 मार्च की शामऔर मदन चुप हो गया।

चंद ही लम्हों में वह रोने से ज़रा इधर और घिघ्घी से ज़रा उधर पहुँच गया।इंदू ने घबरा कर मदन का सर अपनी छाती से लगा लिया।उस रोने ने पल भर में इंदू को अपने पर से इधर बे-गाने पन से उधर पहुँचा दिया मदन इंदू के बारे में कुछ और भी जान्ना चाहता था लेकिन इंदू ने उसके हाथ पकड़ लिए और कहा।मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूँ जी पर माँ बाप देखे हैं,भाई और भाभियाँ देखी हैं,बीसियों और लोग देखे हैं।इस लिए मैं कुछ समझती बूझती हूँ मैं अब तुमहारी हूँ अपने बदले में तुम से एक ही चीज़ मांगती हूँ।

रोते वक़्त और इसके बाद भी एक नशा था।मदन ने कुछ बे सबरी और???? के मिले जुले शब्दों में कहाक्या मांगती हो? तुम जो भी कहोगी मैं दूँगा।

 

पक्की बातइंदू बोली।मदन ने कुछ उतावले होकर कहा।हाँ हाँ कहा जो पक्की बात।लेकिन उस बीच में मदन के मन में एक वस्वसा आया मेरा कारोबारही मंदा है,अगर इंदू कोई ऐसी चीज़ मांग ले जो मेरी पहुँच ही से बाहर हो तो फिर क्या होगा?लेकि इंदू ने मदन के सख़्त और फैले हुए होथो को अपने मुलाएम हाथों से समेटे हुए उन पर अपने गाल रखते हुए कहा।तुम अपने दुख मुझे दे दो

 

मदन सख़्त हैरान हुआ।साथ ही अपने आप पर एक बोझ उतरता हुआ महसूस हुआ।उसने चांदनी में एक बार फिर इंदू का चेहरा देखने की कोशिश की लेकिन वह कुछ जान पाया।उसने सोचा ये माँ या किसी सहेली का रटा हुआ फ़िक़रा होगा जो इंदू ने कह दिया।जभी ये जलता हुआ आंसू मदन के हाथ की पुश्त पर गिरा।उसने इंदू को अपने साथ लिपटाते हुए कहा।

 

दिए!” लेकिन इन सब बातों ने मदन से उसकी बहीमत छीन ली थी।मेहमान एक एक कर के सब रुख़्सत हुए।चकली भी दो बच्चों को उंगलियों से लगाए सीढ़ियों की ऊँच नीच से तीसरा पेट संभालती हुई चल दी।दरियाबाद वाली फूफी जो अपनेनौ-लखेहार के गुम हो जाने पर शोर मचाती वावेला करती हुई बे-होश हो गई थी और जो ग़ुस्ल ख़ाने में पड़ा हुआ मिल गया था,जहेज़ में से अपने हिस्से के तीन कपड़े ले कर चली गई।फिर चाचा गए।जिनको उनके जे पी हो जाने की खबर तार के ज़रिए मिली थी और जो शायद बद हवासी में मदन की बजाए दुल्हन का मुंह चूमने चले थे।

 

घर में बूढ़ा बाप रह गया था और छोटे बहन भाई।छोटी दुलारी तो हर वक़्त भाभी की ही बग़ल में घुसी रहती।गली मोहल्ले की कोई औरत दुल्हन को देखे या देखे।देखे तो कितनी देर देखे।ये सब उसके इख़्तियार में था।आख़िर ये सब ख़त्म हुआ और आहिस्ता आहिस्ता पुरानी होने लगी लेकिन काका जी की इस नई आबादी के लोग अब भी जाते।

 

मदन तो उसके सामने रुक जाते और किसी भी बहाने से अदंर चले आते।इंदू उन्हें देखते ही एक दम घूंघट खींच लेती लेकिन उस छोटे से वक़्फ़े में कुछ दिखाई दे जाता बिना घूँघट के दिखाई दे सकता था।

 

मदन का कारोबार गुंदे बरोज़े का था।कहीं बड़ी सपलाई वाले दो तीन जंगलों में चेड़ और देवदार के पेड़ों की जंगल में आग ने लिया था और वह धड़ा धड़ जलते हुए ख़ाक सियाह होकर रह गए थे। शादी की रात बिल्कुल वह हुआ जो मदन ने सोचा था।जब चकली भाभी ने फुसला कर मदन को बीच वाले कमरे में धकेल दिया तो इंदू सामने शालों में लिपटी हुई अंधेरे का भाग बनी जा रही थी।

 

बाहर चकली भाभी और दरियाबादी वाली फूफी और दूसरी औरतों की हंसी,रात के ख़ामोश पानियों में मिश्री की तरह धीरे धीरे घुल रही थी।औरते सब यही समझती थीं इतना बड़ा हो जाने पर भी मदन कुछ नहीं जानता।क्यूँकि जब उसे बीच रात से जगाया तो वह हड़बड़ा रहा था।कहाँ,कहाँ लिए जा रही हो मुझे?”

 

इन औरतों के अपने अपने दिन बीत चुके थे।पहली रात के बारे में उनके शरीर शौहरों ने जो कुछ कहा और माना था,उसकी गूंज उनके थी जैसे बादल का टुकड़ा है जिसकी तरफ़ बारिश के लिए उठा कर देखना ही पड़ता है।न बुरे तो मन्नतें माननी पड़ती हैं।चढ़ावे चढ़ाने पड़ते हैं।जादू टूने करने होते हैं।

 

हालाँकि मदन कालका जी की इस नई आबादी में घर के सामने की जगह में पड़ा उसी वक़्त का मुंतज़िर था।फिर शामत--आमाल पड़ोसी सबते की भैंस उसकी खाट ही के पास बंधी थी जो बार बार फनकारती हुई मदन को सूंघ लेती थी और वह हाथ उठा उठा कर उसे दूर रखने की कोशिश करता।ऐसे में भला नींद का सवाल ही कहाँ था?

 

समुंदर की लहरों और औरतों के ख़ून को रास्ता बताने वाला चाँद एक खिड़की के रास्ते से अंदर चला आया था और देख रहा था।दरवाज़े के इस तरफ़ खड़ा मदन अगला क़दम कहाँ रखता है।मदन के अपने अंदर एक घुन गरज सी हो रही थी और उसे अपना यूँ मालूम हो रहा था जैसे बिजली का खम्बा है जिसे कान लगाने से उसे अंदर की संसनाहट सुनाई दे जाएगी।

 

कुछ देर यूँ खड़े रहने के बाद उसने आगे बढ़ कर पलंग को खीच कर चांदनी में कर दिया ताकि दुल्हन का चेहरा देख सके।फिर वह ठिठुक गया। जब उसने सोचा इंदू मेरी बीवी है।कोई पराई औरत तो नही जिसे छूने का सबक़ बचपन ही से पढ़ता आया हूँ।शालो में लिपटी हुई दुल्हन को देखते हुए उसने फर्ज़ कर लिया,वहाँ इंदू का मुंह होगा।

 

और जब हाथ बढ़ा कर उसने पास पड़ी घड़ी को छुआ तो वहीं इंदू का मुंह था।मदन ने सोचा था वह आसानी से मुझे अपना आप देख देगी लेकिन इंदू ने ऐसा किया।जैसे पिछले कई सालों से वह भी उसी लम्हे की मुंतज़िर हो और किसी ख़याली भैंस के सूंघते रहने से उसे भी नींद रही हो।ग़ाएब नींद और बंद आँखों का कर्ब अंधेरे के बावजूद सामने फड़फड़ाता हुआ नज़र रहा था।

 

ठोड़ी तक पहुँचते हुए आम तौर पर चहरा लम्बूतरा हो जाता है लेकिन यहाँ तो सभी गोल था।शायद इसी लिए चांदनी की तरफ़ गाल और होंटों के बीच एक साएदार कोह सी बनी हुई थी।जैसे दो सरसब्ज़ और शादाब टीलों के बीच होती है। माथा कुछ तंग था लेकिन उस पर से एका एकी उठने वाले घुंघरियाले बाल।

 

 

जभी इंदू ने अपना चेहरा छुड़ा लिया जैसे वह देखने की इजाज़त तो देती हो लेकिन इतनी देर के लिए नहीं।आख़िर शर्म की भी तो कोई हद होती है।मदन ने ज़रा सख़्त से पूरी यूँ ही सी हों हाँ करते हुए दुल्हन का चेहरा फिर से ऊपर को उठा दिया और शराबी सी आवाज़ में कहा।इंदू!”

 

इंदू कुछ डर सी गई।ज़िंदगी में पहली बार किसी अजनबी ने उसका नाम इस अंदाज से पुकारा था और वह अजनबी किसी ख़ुदाई हक़ से रात के अंधेरे में आहिस्ता आहिस्ता इस अकेली बे यार--मददगार औरत का अपना होता जा रहा था।

 

मैंने तो अभी से चार सूट और कुछ बर्तन अलग कर डाले हैं इसके लिए और जब मदन ने कोई जवाब दिया ते उसे झिंझोड़ते हुए बोलीतुम क्यूँ परेशान होते हो याद नहीं अपना वचन? तुम अपने दुख मुझे दे चुके हो।

 

ईं?” मदन ने चौंकते हुए कहा और जैसे बे-फ़िकर हो गया लेकिन अब के जब उसने इंदू को अपने साथ लिपटाया तो वहाँ एक जिस्म ही नहीं रह गया था साथ एक रूह भी शामिल हो गई थी।

 

मदन के लिए इंदू रूह ही रूह थी।इंदू का जिस्म भी था लेकिन हमेशा किसी किसी वजह से मदन की नज़रों से ओझल ही रहा।एक पर्दा था।ख़्वाब के तारों से बना हुआ।उन्हों के धुएँ से रंगीन क़हकहों की ज़र तारी से चकाचौंद जो हर वक़्त इंदू को ढांपे रहता था।मदन की निगाहों और उसके हाथों के दोशान सदयों से द्रुवपदी का चेर हरन करते आए थे जो कि हर्फ़--आम में बीवी कहलाती है लेकिन हमेशा उसे आसमानों से थानों के थान,गज़ो के गुज़र,कपड़ा नंगापन ढांपने के लिए मिलता आया था।

 

दुशासन थक हार के यहाँ वहाँ गिरे पड़े थे लेकिन द्रुवपदी वहीं खड़ी थीं,इज़्जत और पाकीज़गी की एक सफेद और बे-दाग़ सारी में मलबूस वह देवी लग रही थी।और मदन के लौटते हुए हाथ ख़ुजालत के पसीने से तर हुए,जिसे सूखाने के लिए वह उन्हें ऊपर हवा में उठा देता।

 

और फिर उंग्लियों के बीच में झांकता इंदू का मरमरीं जिस्म ख़ुश रंग और गुदाज़ सामने पड़ा होता।इस्तेमाल के लिए पास,इब्तिज़ाल के लिए दूर कभी जब इंदू की नाका-बंदी हो जाती तो इस क़िस्म के फ़िक़रे होतेहाय जीघर में छोटे बड़े हैं वह क्या कहेंगे?मदन कहताछोटे समझते नहीं बड़े अंजान बन जाते हैं।

 

इसी दौरान में बाबू धनी राम की तब्दीली सहारन पुर हो गई।वहाँ वह रेलवे मेल सर्विस में सेलेक्शन ग्रेड के हेड कलर्क हो गए।इतना बड़ा क्वाटर मिला कि उसमें आठ कुंबे रह सकते थे लेकिन बाबू धनी राम उसमें अकेले ही टांगे फैलाए खड़े रहते।

 

ज़िंदगी भर वह बाल बच्चों से कभी अलाहएदा नहीं हुए थे।सख़्त घरेलू क़िस्म के आदमी।आख़िर ज़िंदगी में इस तन्हाई ने उनके दिल में वहशत पैदा कर दी लेकिन मजबूरी थी, बच्चे सब दिल्ली में मदन और इंदू के पास और वहीं स्कूल में पढ़ते थे।साल के ख़ातिमे से पहले उन्हें बीच में उठाना उनकी पढ़ाई के लिए अच्छा था।बाबू जी के दिल के दौरे पड़ने लगे।

 

बारे गर्मी की छुट्टियाँ हुईं।उनके बार बार लिखने पर मदन ने इंदू को कुंदन,पाशी और दुलारी के साथ सहारन पुर भेज दिया धनी राम की दुनिया चमक उठी।कहाँ उन्हें दफ़्तर के काम के बाद फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत थी और कहाँ अब काम ही काम था।बच्चे बच्चों ही की तरह जहाँ कपड़े उतारते हैं वहीं पड़े रहने देते और बाबू जी उन्हें समेटते हुए फिरते।

 

अपने मदन से दूर अलसानी हुई रती,इंदू तो अपने पहनावे तक से ग़ाफ़िल हो गई थी।वह रसोई में यूँ फिरती थी जैसे कांजी हाउस में गाए,बाहर की तरफ़ मुंह उठा उठा कर अपने मालिक को ढूँढा करती हो।काम वाम करने के बाद वह कभी इंदू टरंकों पर लेट जाती।कभी बाहर कनीर के बूटे के पास और कभी आम के पेड़ तले जो आंगन में खड़ा सैंकड़ों हज़ारों दिलों को थामे हुए था।

 

सावन भादों में ढलने लगा।आंगन में बाहर का दरीचा खुलता तो कंवारियाँ, नई ब्याही हुई लड़कियाँ पींग बढ़ाते हुए गातीं झूला कुनते डारवरे अमरियाँ और फिर गीत के बोल के मुताबिक़ दो झूलतीं और कहीं चार जातीं तो मिल जाती तो भूल भुलय्याँ हो जाती।अधेड़ उम्र की बूढ़ी औरतैं एक तरफ़ खड़ी तका करती।इंदू को मालूम होता जैसे वह भी उनमें शामिल हो गई है।जभी वह मुंह फेर लेती और ढंण्डी सांसे भरती हुई सो जाती।बाबू जी पास से गुज़रते तो उसे जगाने, उठाने की ज़रा भी कोशिश करते।

 

मैसूर और आसाम तरफ़ से मंगवाया हुआ बेरोज़ह महंगा पड़ता था और लोग उसे महंगे दामों ख़रीदने को तैय्यार थे।एक तो आमदनी कम हो गई थी।इस पर मदन जल्दी ही दुकान और उसके साथ वाला दफ़्तर बंद करके घर चला आता।घर पहुँच कर उसकी सारी कोशिश यही होती कि सब खाएँ पिएँ और अपने अपने बिस्तरों में दुबक जाएँ।जब वो खाते वक़्त ख़ुद थालियाँ उठा उठा कर बाप और बहन के सामने रखता और उनके खा चुकने के झूटे बर्तनों को समेट कर्नल के नीचे रख देता।

 

सब समझते बहू।भाबी ने मदन के कान में कुछ फूंका है और अब वो घर के काम काज में दिलचस्पी लेने लगा है।मदन सब से बड़ा था।कुन्दन उस से छोटा और पाशी सब से छोटा।जब कुन्दन भाबी के स्वागत में सब के एक साथ बैठ कर खाने पर इसरार करता तो बाप धनी राम वहीं डांट देता।

 

"खाओ तुम।" वो कहता "वो भी खा लेंगे" और फिर रसोई में इधर उधर देखने लगता और जब बहू खाने पीने से फ़ारिग़ हो जाती और बर्तनों की तरफ़ मुतवज्जा होती तो बाबू धनी राम उसे रोकते हुए कहते। "रहने दे बहू बर्तन सुब्ह हो जाएँगे।"

 

इंदू कहती "नहीं बाबू जी मैं अभी किए देती हूँ झपाके से।"तब बाबू धनी राम एक लरज़ती हुई आवाज़ में कहते "मदन की माँ होती बहू,तो ये सब तुम्हें करने देती।? और इंदू एक दम अपने हाथ रोक लेती।छोटा पाशी भाबी से शर्माता था।

 

इस ख़याल से कि दुल्हन की गोद झट से हरी हो, चमकी भाबी और दरियाबाद वाली फूफी ने एक रस्म में पाशी ही को इंदू की गोद में डाला था।जब से इंदू उसे सिर्फ़ देवर बल्कि अपना बच्चा समझने लगी थी।जब भी वो प्यार से पाशी को अपने बाज़ुओं में लेने की कोशिश करती तो वो घबरा उठता और अपना आप छुड़ा कर दो हाथ की दूरी पर खड़ा हो जाता।देखता और हंसता रहता।पास आता तो दूर हटता।

 

एक अजीब इत्तिफ़ाक़ से ऐसे में बाबू जी हमेशा वहीं मौजूद होते और पाशी को डाँटते हुए कहते "अरे जाना भाबी प्यार करती है अभी से मर्द हो गया तू?" और दुलारी तो पीछा ही छोड़ती उसका।"मैं तो भाबी के साथ ही सोऊंगी।"के इसरार ने बाबू जी के अंदर कोई जनार्धन जगह दिया था।

 

एक रात इस बात पर दुलारी को ज़ोर से चपत पड़ी और वो घर की आधी कच्ची, आधी पक्की नाली में जा गिरी।इंदू ने लपकते हुए पकड़ा तो सर से दुपट्टा उड़ गया।बालों के फूल और चिड़ियाँ,मांग का सिंदूर, कानों के करण फूल सब नंगे हो गए।"बाबू जी।" इंदू ने सांस खींचते हुए कहा एक साथ दुलारी को पकड़ने और सर पर दुपट्टा ओढ़ने में इंदू के पसीने छूट गए।

 

इस बे माँ बच्ची को छाती से लगाए हुए इंदू ने उसे एक ऐसे बिस्तर में सुला दिया जहाँ सिरहाने ही सिरहाने, तकिए ही तकिए थे।न कहीं पावंती थी काठ के बाज़ू।चोट तो एक तरफ़ कहीं को चुभने वाली चीज़ भी थी।

 

फिर इंदू की उंगलियाँ दुलारी के फोड़े ऐसे सर पर चलती हुई उसे दिखाई भी रही थीं और मज़ा भी दे रही थीं। दुलारी के गालों पर बड़े बड़े और प्यारे प्यारे गढ़े पड़ते थे।इंदू ने इन गढ़ों का जाएज़ा लेते हुए कहा "हाय री मन्नी!तेरी सास मरे, कैसे गढ़े पड़ रहे हैं गालों पर!"

 

मन्नी ने मन्नी की तरह कहा।"गढ़े तुम्हारे भी तो पड़ते हैं भाबी।""हाँ मन्नू!" इंदू ने कहा और एक ठंडा सांस लिया।मदन को किसी बात पर ग़ुस्सा था।वो पास ही खड़ा सब कुछ सुन रहा था।"मैं तो कहता हूँ एक तरह से अच्छा ही है।""क्यूँ अच्छा क्यूँ है?" इंदू ने पूछा।

 

"हाँ ना उगे बाँस बजे बानुसरी सांस हो तो कोई झगड़ा नहीं रहता।" इंदू ने एका एकी ख़फ़ा होते हुए कहा।"तुम जाओ जी सो रहो जा कर बड़े आए हो आदमी जीता है तो लड़ता है ना? मरघट की चुपचाप से झगड़े भले।जाओ रसोई में तुम्हारा क्या काम?"

 

मदन खिसियाना होकर रह गया।बाबू धनी राम की डांट से बाक़ी बच्चे तो पहले ही अपने अपने बिस्तरों में यूँ जा पड़े थे जैसे दफ़्तरों में छुट्टियाँ स्टार्ट होती हैं।लेकिन मदन वहीं खड़ा रहा। एहतियाज ने उसे ढीट और बे-शरम बना दिया था लेकिन उस वक़्त जब इंदू ने भी उसे डांट दिया तो वो रोहांसा होकर अन्दर चला गया।

 

देर तक मदन बिस्तर में पड़ा कसमसाता रहा लेकिन बाबू जी के ख़याल से इंदू को आवाज़ देने की हिम्मत पड़ती थी।उसकी बेस्ब्री की हद हो गई थी।जब मन्नी को सुलाने के लिए इंदू के लोरी की आवाज़ सुनाई दी" तो आनंद या रानी, बौराई मस्तानी।"

 

वही लोरी जो दुलारी मन्नी को सुला रही थी, मदन की नींद भगा रही थी।अपने आप से बेज़ार होकर उसने ज़ोर से चादर सर पर खींच ली।सफ़ैद चादर के सर पर लपेटने और सांस के बंद करने से ख़्वाह मख़्वाह एक मुर्दे का तसव्वुर पैदा हो गया।

 

मदन को यूँ लगा जैसे वो मर चुका है और उसकी दुल्हन इंदू उसके पास बैठी ज़ोर ज़ोर से सर पीट रही है, दीवार के साथ कलाइयाँ मार मार कर चूड़ियाँ तोड़ रही है और फिर बाहर लपक जाती है और बाँहें उठा उठा कर अगले मोहल्ले के लोगों से फ़र्याद करती है।"लोगो! मैं लुट गई।"अब उसे दुपट्टे की परवाह नहीं।क़मीज़ की परवाह नहीं।मांग का सींदूर, बालों के फूल और चूड़ियाँ, जज़्बात और ख़यालात के तोते तक उड़ चुके हैं।

 

मदन की आँखों से बे-तहाशा आँसू बह रहे थे।हालाँकि रसोई में इंदू हंस रही थी।पल भर में अपने सुहाग के उजड़ने और फिर बस जाने से बे-ख़बर।मदन जब हक़ायक़ की दुनिया में वापस आया तो आँसू पोंछते हुए अपने उस रोने पर हंसने लगा उधर इंदू तो हंस रही थी लेकिन उसकी हंसी दबी दबी थी।

 

बाबू जी के ख़याल से वो कभी ऊंची आवाज़ में हंसती थी जैसे खिलखिलाहट कोई नंगापन है, ख़ामोशी, दुपट्टा और दबी दबी हंसी एक घूंगट।फिर मदन ने इंदू का एक ख़याली बुत बनाया और उस से बीसियों बातें कर डालें।यूँ उस से प्यार किया जैसे अभी तक किया था वो फिर अपनी दुनिया में लौटा जिसमें साथ का बिस्तर ख़ाली था।

 

उसने होले से आवाज़ दिया इंदू एक ऊँघ सी आई लेकिन साथ ही यूँ लगा जैसे शादी की रात वाली, पड़ोसी सिब्ते की भैंस मुँह के पास फुँकारने लगी है।वो एक बेकली के आलम में उठा, फिर रसोई की तरफ़ देखते, सर को खुजाते हुए दो तीन जमाइयाँ लेकर लेट गया सो गया

 

मदन जैसे कानों को कोई संदेसा देकर सोया था।जब इंदू की चूड़ियाँ बिस्तर की सिलवटें सीधी करने से खनक उठीं तो वो भी हड़बड़ा कर उठ बैठा।यूँ एक दम जागने में मोहब्बत का जज़्बा और भी तेज़ हो गया था।प्यार की करवटों को तोड़े बगै़र आदमी सो जाए और एका एकी उठे तो मोहब्बत दम तोड़ देती है।मदन का सारा बदन अंदर की आग से फुंक रहा था।और यही उसके ग़ुस्से का कारण बन गया।जब उसने बौखलाए हुए अंदाज़ में कहा।

 

"तो तुम गईं?"

"हाँ।"

"सनी सो मर गई?"

 

इंदू झक्की झक्की एक दम सीधी खड़ी हो गई।"हाय राम" उसने नाक पर उंगली रखते हुए हाथ मलते हुए कहा।"क्या कह रहे हो मरे क्यूँ बेचारी।माँ बाप की एक ही बेटी।"

 

"हाँ मदन ने कहा।"भाभी की एक ही नंद।"और एक दम तहक्कुमाना लहजा इख़्तियार करते हुए बोला।"ज़्यादा मुँह मत लगाओ उस चुड़ैल को।"

 

"क्यूँ इस में क्या पाप है?"

"यही पाप है" मदन ने और चिड़ते हुए कहा।"वो पीछा ही नहीं छोड़ती तुम्हारा।जब देखो जोंक की तरह चिम्टी हुई है।दफ़ान ही नहीं होती।"

 

"हा इंदू ने मदन की चारपाई पर बैठते हुए कहा।"बहनों और बेटियों को यूँ तो धुतकारना नहीं चाहिए।बेचारी दो दिन की मेहमान।।आज नहीं तो कल।कल नहीं तो परसों।एक दिन तो चल ही देगी।" इसके बाद इंदू कुछ कहना चाहती थी लेकिन वो चुप हो गई।उसकी आँखों के सामने अपने माँ बाप, भाई बहन चचा भी घूम गए।

 

कभी वो भी उनकी दुलारी थी।जो पलक झपकते ही न्यारी हो गई।और फिर दिन रात उसके निकाले जाने की बातें होने लगीं।जैसे घर में कोई बड़ी सी बाहनी है जिसमें कोई नागिन रहती है और जब तक वो पकड़ कर फूंकवाई नहीं जाती।घर के लोग आराम की नींद सो नहीं सकते।दूर दूर से कीलने वाले लथन करने वाले।